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शुष्क व सरकारी भाषा के पक्षधर नहीं थे अज्ञेय: अंसारी
कोलकाता, एजेंसी
First Published:22-02-12 06:06 PM
Last Updated:22-02-12 06:17 PM
भारतीय साहित्य में अज्ञेय के योगदान को महत्वपूर्ण करार देते हुए उप राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने बुधवार को कहा कि वह कभी शुष्क और सरकारी भाषा के पक्षधर नहीं थे और उन्होंने हमेशा ऐसी जीवंत भाषा को आगे बढ़ाने की वकालत की जो आम आदमी के मन की गहराई से उपजती है।
अंसारी ने आज यहां सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय के जन्मशताब्दी समारोह का उद्घाटन करते हुए कहा कि अज्ञेय हिन्दी को एक जीवंत और विकासमान भाषा बनाने के लिए संघर्ष करते रहे न कि मानक, नियमों से बंधी और सार्वभौम रूप से स्वीकार्य हिन्दी के लिए। ऐसी हिन्दी के बारे में उनका मानना था कि यह महज सरकारी अधिसूचनाओ और नियमनों के लिए अच्छी हो सकती है।
अंसारी ने कहा कि अज्ञेय मानते थे कि इस प्रकार का मानकीकरण और शुष्क भाषा साक्षरता के प्रसार के लिए फायदेमंद हो सकती है। उन्होंने कहा कि मानकीकरण साक्षरता का तर्क हो सकता है, राष्ट्रीय भाषा का नहीं। उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने हमेशा यह बात बल देकर कही कि भाषा कभी कृत्रिम रचना नहीं हो सकती। इसे विकासमान होना चाहिए और यह आम आदमी और औरत के मन की गहराई से उपजनी चाहिए।
अंसारी ने उनकी कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि वह (अज्ञेय) मानते थे कि राजनीति पर कविता ही कविता का सर्वोत्तम उपयोग है। इसके बावजूद वह इस बात की पहचान करने और आगाह करने के प्रति सतर्क थे कि देशभक्ति वाली कविता से ऐसी नौबत नहीं आनी चाहिए कि इनके चलते धार्मिक, आध्यात्मिक अथवा धार्मिक राष्ट्रवाद पर अधिक जोर दिया जाने लगे।
उपराष्ट्रपति ने अज्ञेय को बहुमुखी प्रतिभावाला रचनाकार बताया और कहा कि उन्होंने अपने को विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के पदचिन्हों पर चलने वाली साहित्यिक शख्सियत के रूप में स्थापित किया। उन्होंने कविता, कहानियों, आलोचना, उपन्यास, निबंध यात्रा वृत्तांत सहित विभिन्न विधाओं में लिखा। उन्होंने पत्रकारिता में भी योगदान दिया और गरीबों में दबे कुचले लोगों के हितों को उठाया।
अंसारी ने कहा कि अज्ञेय एक राष्ट्रभक्त और क्रांतिकारी थे जिनके मन पर चन्द्रशेखर आजाद की गहरी छाप पड़ी थी। उन्होंने कुछ समय सेना में भी काम किया था। उनकी शिक्षा क्षेत्र में विशेषकर हिन्दी शिक्षण में भी रूचि थी।
समारोह के विशिष्ट अतिथि एवं पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम.के. नारायणन ने कहा कि हिन्दी साहित्य से परिचित कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि अज्ञेय ने हिन्दी के विकास और प्रसार के लिए मौलिक योगदान दिया है। कहा जाता है कि हमारी सभ्यता का साहित्यिक परिदृश्य अज्ञेय के योगदान से काफी समृद्ध हुआ है। नारायणन ने ध्यान दिलाया कि अज्ञेय महज एक साहित्यकार नहीं थे। उन्होंने देश के क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी जिससे भारत को विदेशी शासन से गुलामी मिली।
कोलकाता से अज्ञेय के संबंध की ओर ध्यान दिलाते हुए नारायणन ने कहा कि अज्ञेय की यहां गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से मुलाकात हुई थी। इसी जगह उन्हें प्रसिद्ध नत्यांगना रूक्मणि देवी अरूंदाले ने 1980 में भारतीय साहित्य का शीर्ष पुरस्कार ज्ञानपीठ प्रदान किया था।
अज्ञेय के जन्मशताब्दी समारोह में उपराष्ट्रपति ने जनसत्ता के संपादक ओम थानवी द्वारा संपादित पुस्तक अपने अपने अज्ञेय प्रकाशित की। दो खंडों में आयी इस पुस्तक में निर्मल वर्मा, विष्णु प्रभाकर, रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी सहित 100 साहित्यकारों एवं रचनाधर्मिंयों के अज्ञेय संबंधी संस्मरणों को संकलित किया गया है।
समारोह में वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने कहा कि कोलकाता ने भारतीय साहित्य के दो महान लेखकों, गालिब और अज्ञेय के मन में गहरे साहित्यिक संस्कार छोड़े। उन्होंने कहा कि अज्ञेय गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी गहरे तौर पर प्रभावित थे और अपनी रचनाओं में उनकी कविताओं का कई बार उल्लेख करते थे।
सिंह ने कहा कि हिन्दी साहित्य में निराला के उपर टैगोर के प्रभावों पर तो काफी अध्ययन हुआ, लेकिन अज्ञेय के बारे में भी ऐसे अध्ययन अधिक नहीं हुए हैं। ऐसे अध्ययनों से हमारा साहित्य समृद्ध होगा। वरिष्ठ कला समीक्षक एवं कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में विधाओं और दृष्टि की यायावरी भी देखने को मिलती है। उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने अपने साहित्य में व्यक्ति की गरिमा, सामाजिक जिम्मेदारी और स्वाधीनता पर सदैव बल दिया।
साहित्य अकादमी और प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस समारोह में अज्ञेय की कविताओं के बांग्ला अनुवाद का बांग्ला फिल्मों के वरिष्ठ अभिनेता सौमित्र चटर्जी और अर्पिता चटजी ने और अंग्रेजी अनुवाद का रितुपर्णा सेनगुप्ता ने पाठ किया।
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