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आखिर कस्तूरबा गांधी को 'मां' क्यों बुलाते थे बापू
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:21-02-12 01:27 PM
Last Updated:21-02-12 01:30 PM
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कस्तूरबा गांधी ने राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी की धर्मपत्नी से अलग स्वतंत्रता संग्राम की एक अहम महिला नेत्री के तौर पर भी अपनी पहचान बनाई थी और उनके अंदर कूट-कूट कर भरे वात्सल्य से खुद बापू इतने अधिक प्रभावित थे कि वह उन्हें 'बा' कह कर बुलाते थे।
   
एक पत्नी के तौर पर कस्तूरबा ने अपने पति के हर काम में उनका साथ दिया और घरेलू जिम्मेदारियों से उन्हें मुक्त रखा। शायद यही वजह है कि बापू पूरे समर्पण के साथ दिन-रात देश की आजादी के लिए संघर्षरत रह सके। दिलचस्प बात यह है कि बापू खुद बा को अपनी एक प्रेरक आलोचक भी मानते थे।
  
नई दिल्ली स्थित गांधी संग्रहालय की निदेशक वर्षा दास ने बताया कि गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दिनों में कस्तूरबा ने वहां पर विवाह कानून के खिलाफ सत्याग्रह का नेतृत्व किया था। इस सत्याग्रह में उन्हें सफलता भी मिली। इस तरह से बा को गांधी जी से पहले ही सत्याग्रह के प्रयोग मे सफलता मिल गयी।
   
कस्तूरबा गांधी के इस सत्याग्रह ने महिलाओं को घर से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कस्तूरबा घर में रह कर जिस तरह शांतिपूर्वक अपना दायित्व निर्वाह करती थी इससे प्रभावित होकर गांधी जी ने कहा था कि मैने अहिंसा का पाठ कस्तूरबा से सीखा है। साथ ही कस्तूरबा बापू के कामकाज पर अपनी प्रतिक्रिया भी देती थीं और बापू उन्हें अपनी एक प्रेरक आलोचक मानते थे।
   
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र के प्रोफेसर आनंद कुमार ने बताया कि कई बार गांधी जी के प्रयोगों और कार्यक्रमों से असहमत रहने के बावजूद कस्तूरबा ने हमेशा उनका समर्थन किया।
   
प्रोफेसर आनंद कुमार ने बताया विश्व के महान नेताओं में से एक गांधी को आदर्श जीवन संगनी का साथ मिला। बापू के समकालीन नेताओं अब्राहम लिंकन, लेनिन, माओत्से तुंग जैसे अन्य नेताओं को यह सौभाग्य नहीं मिल सका। यही कारण है कि बापू ने कस्तूरबा को जीवन संगिनी के रूप में अपनी सफलता का मूल आधार कहा था।
   
कस्तूरबा गांधी का जन्म सुखी संपन्न एक व्यापारी गोकुलदास कपाडिया के यहां गुजरात के पोरबंदर में 11 अप्रैल 1869 में हुआ था। जब मोहनदास करमचंद गांधी के साथ कस्तूरबा परिणय सूत्र में बंधीं उस समय उनकी उम्र केवल 14 साल की थी।
   
कस्तूरबा गांधी के जीवन के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए गांधी स्मारक निधि के मंत्री और गांधीवादी रामचंद्र राही ने कहा एक बार सौराष्ट्र जेल जाने से पहले बा ने बापू से पूछा कि था कि क्या उन्हें जेल जाना चाहिए। गांधी जी ने जबाव दिया कि जरूर जाना चाहिए। बा ने फिर सवाल किया अगर जेल में मेरी मौत हो गयी तब, गांधी जी ने जवाब दिया कि तब मैं तुम्हें जगदम्बा कह कर संबोधित करूंगा।
   
उन्होंने बताया कि वर्ष 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत हुयी तब कस्तूरबा को आगा खा पैलेस में नजरबंद रखा गया था। असाध्य बीमारी के कारण कस्तूरबा ने बापू की गोद में दम तोड़ दिया। तब गांधी जी ने कहा था कि कस्तूरबा मेरी आराध्य बन गयी।
   
प्रोफेसर आनंद कुमार ने कहा कि एक आदर्श नारी, अनुकरणीय पत्नी, और प्रेरणादायी मां के रूप में कस्तूरबा देश के स्त्री पुरूषों के लिए एक अनुकरणीय विरासत छोड़ गयी हैं। कस्तूरबा गांधी का 74 साल की उम्र में 22 फरवरी 1944 को निधन हो गया।

 
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