सोमवार, 21 मई, 2012 | 19:52 | IST
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मां की ममता
First Published:06-02-12 09:52 PM
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हमारी संस्कृति में मां को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। मां ममता की मूरत होती है। पर इस मां की ममता कहां छिपी हुई है, जिसने फलक को पैदा तो किया, पर जिंदगी और मौत के बीच छोड़ दिया? क्या इस मासूम की मां का दिल धड़कता नहीं होगा अपनी बेटी को देखने के लिए? जहां पूरा हिन्दुस्तान इस बच्ची के लिए दुआ कर रहा है, वहीं फलक के माता-पिता इसकी कोई खोज-खबर नहीं ले रहे। आखिर इस मासूम का कुसूर ही क्या था? भले ही फलक की मां की तलाश में पुलिस दिन-रात एक करके जुटी रही, लेकिन मैं तो भगवान से यही प्रार्थना करता रहा कि उसकी मां खुद सामने आए, ताकि ममता की लाज बनी रहे।
मनीष कुमार, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली

योजनाओं से फायदा
दिल्ली नगर निगम ने गरीब बुजुर्गों, विकलांगों तथा विधवाओं की पेंशन राशि बढ़ा दी है। इस कदम की जितनी भी सराहना की जाए, कम है। परंतु इस योजना का गलत इस्तेमाल न हो, इसके लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहले तो लाभार्थी तबके से यह शपथ पत्र भरवाना जरूरी है कि उनके पास कोई चल/अचल संपत्ति नहीं है। मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं, जिनके पास करोड़ों के मकान हैं, परंतु सरकार से पेंशन लेते हैं। सरकार को इस तरफ ध्यान देना होगा। इसके अलावा विकलांग, विधवा व वृद्ध लोगों को सरकार स्वरोजगार के अवसर भी मुहैया कराए, ताकि सरकारी पेंशन पर उनकी निर्भरता कम हो सके। इन दिनों इस तरह की खबरें भी आई हैं कि सरकारी दफ्तरों में कई पद खाली हैं। ऐसी जगहों पर जरूरतमंद वरिष्ठ नागरिकों की बहाली अस्थायी तौर पर की जा सकती है। विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है, जबकि लाखों सेवानिवृत्त शिक्षकों का वक्त यूं ही बेकार हो रहा है। इनकी योग्यता का लाभ उठाया जा सकता है।
एच. बी. शर्मा, जनकपुरी, नई दिल्ली

सुरक्षा पहली प्राथमिकता
दिल्ली की सड़कें सबके लिए अब महफूज नहीं रहीं। एक तरफ आए दिन बुजुर्ग व बच्चाे सड़कों पर दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ महिलाओं से लूटपाट की घटनाएं भी बढ़ी हैं। हाल ही में विदेशी महिलाओं को लूटकर बाइकर्स भाग गए। दरअसल प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता की सुरक्षा उसकी पहली प्राथमिकता है। इसके लिए सड़कों पर सबसे पहले सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करनी होगी।
दीपक कुमार, खानपुर, दिल्ली

खेल की तरह देखो
खेल दो टीमों के बीच खेला जाता है, जिसमें एक टीम जीतती है और दूसरी हारती है। जब भी कोई मुकाबला दो के बीच होगा, तो जीत एक की ही होगी। फिर यह भी हमेशा मुमकिन नहीं होता कि जीत हमारी ही हो। तो फिर क्यों खेल को एक जंग बना दिया जाता है, जिसमें जीत-हार को जीने-मरने के समान माना जाता है? क्या यह सही है कि जीतने पर टीम या खिलाड़ी को आसमान पर पहुंचा दिया जाए और अगर वही टीम हार जाए, तो उसे फर्श पर पटका जाए? लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में क्रिकेट इसी भावना से दो-चार हो रहा है। जब महेंद्र सिंह धौनी की टीम वर्ल्ड कप जीतती है, तो उसकी तारीफों के ऐसे पुल बांधे जाते हैं, जैसे उससे बेहतर न कोई है और न होगा। लेकिन कुछ महीनों बाद ही धौनी की अगुवाई में वही टीम सीरीज हारती है, तो धौनी की ऐसी आलोचना होती है, जैसे उन्होंने कोई अपराध किया हो। ताज्जुब तो तब होता है, जब खुद इस स्थिति से गुजरने वाले पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी भी ऐसी ही बातें करते हैं। क्या हमेशा एक ही टीम जीतती रहे, यह संभव है? हमें यह समझना होगा कि खेल में जीत होगी, तो हार भी होगी।
सोनल पंवार, उत्तरी छज्जूपुर, शाहदरा, दिल्ली

 

 
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खेल में हार जीत होती है इसे सभी जानते हैं पर अस्वभाबिक हार होने से लोगों को परेशानी अवश्य होती है ५ दिन का टेस्ट मैच तिन दिन भी नहीं खेल पाते तो कितनी शर्म लगती है इसे खेल के मैदान में बैठ कर जाना जाता है इसके लिए अमानुषिक आचरण का मैं कभी भी समर्थन नहीं हारते जाना भी लोग पसंद नहीं कर पाते हार जीत होती रहे हैं
By Asit mukherjee (7th-February-2012 10:07:AM)
 
 
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