सोमवार, 21 मई, 2012 | 19:52 | IST
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जब हो गलती तो मान लो
First Published:04-02-12 08:30 PM
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कैथरिन शुल्ज अमेरिका की जान-मानी पत्रकार हैं। उनकी किताब बीइंग रांग: एडवेंचर इन द माजिर्न ऑफ एरर और इस विषय पर उनके लेक्चर काफी लोकप्रिय हुए हैं। इस किताब में उन्होंने लोगों की गलतियां छिपाने की आदत को बखूबी बयां किया है। हम अक्सर अपने चारों ओर मौजूद चीजों को लेकर भ्रमित हो जाते हैं और कई बार इसके बारे में गलत सवाल पूछ बैठते हैं। जब सामने वाला अहसास कराता है कि हम गलत हैं, तो हमारा रवैया अजीब होता है। हम ऐसे पेश आते हैं, जैसे हमने कुछ गलत नहीं पूछा। मैंने पांच साल तक सोचा कि गलती करने के बाद हमें इसे स्वीकार करने में दिक्कत क्यों होती है। हमसे गलतियां होती हैं। यह मानव की प्रवृत्ति है। इसमें कुछ भी अजीब नहीं।

गलती मानने में दिक्कत क्यों
गलती करने के बाद भी अपनी बात पर अड़े रहने की दिक्कत अक्सर सामने आती है। यह दिक्कत निजी जिंदगी और कार्यस्थल, दोनों जगहों पर देखने को मिलती है। अब मैं दो बिंदुओं पर बात करूंगी, एक तो यही कि आखिर हमें क्यों लगता है कि हम हमेशा सही ही होते हैं। दूसरे यह कि हम अपने मन में सही होने की धारणा क्यों पालते हैं। आप इस भ्रम से बाहर निकलकर अपनी गलती को स्वीकार करें, तो बेहतर होगा। यह बहुत मुश्किल नहीं है। आप ऐसा कर सकते हैं।

सही होने की जिद क्यों
हमारे मन में सही होने की जिद क्यों बनी रहती है। अब जरा महसूस कीजिए कि गलती मानने पर आपके अंदर किस तरह की भावना पनपती है। अब मैं आपसे पूछती हूं कि ‘मैं गलत हूं’, यह बात मानने पर आपको कैसा लगता है। यह भावनात्मक सवाल हो सकता है। गलती स्वीकार करने पर शर्म महसूस होती है। गलती मानने पर लोग आप पर हंस भी सकते हैं। आप पर कमेंट कर सकते हैं। जाहिर है, गलती मानना कठिन है। खुद को सही मानने की जिद को मैं ‘एरर ब्लाइंडनेस’ कहती हूं, यानी गलती को लेकर अंधापन।

देर से होता है अहसास
ज्यादातर लोगों को अपनी गलती का अहसास बहुत देर से होता है। दरअसल हमें बहुत दिनों तक यह समझ ही नहीं आता कि हमने गलती कर दी है और जब अहसास होता है, तो काफी देर हो चुकी होती है। दूसरी बात यह है कि हम धीरे-धीरे गलतियों से सबक लेते हैं। यह एक तरह से सहज प्रक्रिया है। जैसे-जैसे हम जिंदगी में आगे बढ़ते हैं, हमें बहुत-सी सही-गलत बातों का अहसास होता जाता है। लेकिन लंबे समय तक हम सही होने की जिद पर अड़े रहते हैं।

बुरे अहसास से दूर रहने की चाहत
इसमें कोई दो राय नहीं कि खुद को गलत मानना वाकई कठिन है। दरअसल जब हम खुद को गलत मानते हैं, तो हमें लगता है कि जरूर हमारे साथ कुछ गड़बड़ है। जाहिर है, यह बुरा अहसास है। इसलिए गलती मानकर हम खुद को इस बुरे अहसास से दूर रखना चाहते हैं। दूसरी तरफ खुद को सही मानने पर हमें लगता है कि हम बहुत स्मार्ट और काबिल हैं। इसका सीधा-सा मतलब है कि हम जिम्मेदार हैं, यानी हम सुरक्षित हैं। यह अच्छा अहसास है। खुद को सही बताकर हम अच्छे अहसास के साथ जीना चाहते हैं।

गलती के बाद अजीबोगरीब तर्क
गलती करने के बाद हम इसे छिपाने के लिए तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। खुद को सही साबित करने के लिए हम अजीबोगरीब तर्क देते हैं, ऐसे तर्क जिनका कोई मतलब नहीं होता है। हम ऐसे बहाने बनाते हैं, जो किसी के गले न उतरें। मैं आपको एक घटना बताती हूं। बॉस्टन के एक नामी अस्पताल में एक महिला अपने पैर की सजर्री के लिए आई। इलाज की पूरी प्रक्रिया ठीक से चली। महिला को होश आया, तो वह चौंक गई। उसने पूछा कि उसके दाहिने पैर की जगह बाएं पर पट्टी पर क्यों बंधी है? डॉक्टर ने गलती से दूसरे पैर का ऑपरेशन कर दिया था। जब अस्पताल प्रशासन से इस बारे में पूछा गया, तो उसका जवाब था, ‘डॉक्टर को लगा कि मरीज के उसी पैर को सजर्री की जरूरत थी।’ यह अजीब जबाब था।

यह तो खतरनाक है
इस कहानी का सबक यह है कि सही होने की भावना पर बेवजह अड़े रहना खतरनाक हो सकता है। दरअसल हम खुद को गलत मानने की संभावना पर विचार ही नहीं करना चाहते हैं। चाहे जो हो जाए, हम खुद को सही साबित करेंगे। मन में डर है कि गलत मानने पर हम फंस जाएंगे। इसलिए अड़े रहो कि हम सही हैं।

जब दूसरे हों असहमत
जरा सोचिए, जो लोग आपसे अहसमत होते हैं, उन्हें आप कैसे समझाएंगे। पहले तो हम बेकार के तर्क देंगे। फिर खुद को समझाएंगे कि जो हमसे असहमत हैं, उन्हें सही जानकारी नहीं है। अगर उन्हें सही जानकारी होती, वे हमसे जरूरत सहमत होते। जब उन्हें सही तथ्यों की जानकारी होगी, तो उन्हें अपनी गलती का अहसास होगा और वे हमसे सहमत हो जाएंगे। इसके बाद भी अगर वे हमसे असहमत बने रहे, तो हम कहते हैं, ‘वे बेवकूफ हैं।’ इससे भी खुद को संतोष न मिले, तो हम कहते हैं, दरअसल वे हकीकत जानते हैं, पर जानबूझकर तथ्यों को नजरअंदाज करके हमसे असहमति जता रहे हैं।

नहीं रुक पाएंगी गलतियां
सबसे अहम बात यह है कि अगर हम अपनी गलती स्वीकार नहीं करेंगे, तो आगे चलकर गलतियां रुकने की संभावनाएं ही खत्म हो जाएंगी। मैं तो कहती हूं कि अगर हमने यह तय कर लिया है कि हम गलती कर ही नहीं सकते, तो इसका सीधा मतलब यह है कि हमारे अंदर मानव प्रवृत्ति ही नहीं है। गलती करना तो मानव प्रवृत्ति है। भला कोई इंसान हमेशा सही कैसे रह सकता है? अजीब बात यह है कि हम खुद को सही मानते हैं और चाहते हैं कि दूसरे भी हमें सही मानें। यह तो नहीं चलेगा।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

 
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