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ममता सरकार से यह उम्मीद नहीं थी
First Published:04-02-12 08:28 PM
सलमान रुश्दी के बाद तसलीमा नसरीन। जयपुर के साहित्य उत्सव में कट्टरपंथियों ने रुश्दी को नहीं आने दिया, तो कोलकाता पुस्तक मेले के आयोजकों ने अपने सभागार में तसलीमा नसरीन की आत्मकथा के सातवें खंड निर्वासन का लोकार्पण समारोह नहीं होने दिया। पुस्तक मेले के आयोजकों ने मजहबी कट्टरपंथियों की धमकी के आगे समर्पण करते हुए तसलीमा की किताब के लोकार्पण के लिए की गई सभागार की बुकिंग रद्द कर दी। इस घटना से बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन बेतरह दुखी हैं। कृपाशंकर चौबे की उनसे बातचीत के अंश:
कोलकाता पुस्तक मेले में जो हुआ, क्या आपको उसकी आशंका थी?
कोलकाता प्रगतिशील लोगों का शहर है और वहां के पुस्तक मेले में मेरी किताब का लोकार्पण नहीं होने दिया गया, जबकि उस अनुष्ठान में मैं स्वयं उपस्थित नहीं थी। कतिपय कट्टरपंथी ताकतों की मांग को मेले के आयोजकों ने मान लिया। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने का मैंने स्वागत किया था, क्योंकि वह एक महिला हैं और पितृसत्तात्मक समाज में उन्होंने अपनी एक भूमिका निभाई है। मैं समझती थी कि वह मेरी वेदना समझोंगी, पर उनकी सरकार ने तो मेरी किताब को ही मेले से निर्वासित कर दिया। उनसे यह उम्मीद नहीं थी। मुझे बहुत दुख पहुंचा है। अब लगता है कि सारी पार्टियां कट्टरपंथियों से डरती हैं। कई बार तो कट्टरपंथियों की मांग के पहले ही सरकारें उन्हें खुश करने के लिए उनकी बात मान लेती हैं। लोकतंत्र के लिए यह खतरनाक है। कट्टरपंथियों के आगे झुकने के मामले में उस पार (बांग्लादेश) और इस पार (भारत, खासकर पश्चिम बंगाल) कोई अंतर है?
देखिए, भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां यदि कट्टरपंथ का पोषण किया जाता है, तो वह पड़ोसी देशों के लिए दृष्टांत बन जाता है। बांग्लादेश व आसपास के देश भारत की घटनाओं को उदाहरण के रूप में पेश करते हैं। इसलिए भारत को कभी भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे कट्टरपंथ को बढ़ावा मिले। भारत में यदि तुष्टीकरण की नीति अपनाई जाएगी, तो दूसरे धर्म के कट्टरपंथियों को नहीं रोका जा सकेगा, बल्कि उन्हें बढ़ने का मौका मिलेगा और वह मौका मिल रहा है। मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकने के मामले में भारत भी बांग्लादेश से अलग नहीं है। बंगाल में सरकार तो बदल गई, किंतु मेरे प्रति इस सरकार का रवैया भी वही है, जो पूर्ववर्ती सरकार का था। तुष्टीकरण की नीति अपनाने वाली राजनीतिक पार्टियों को खुश करने के लिए मेरे कॉलम तक कोलकाता में रोक दिए दए। पहले बांग्ला के अखबारों में मैं कॉलम लिखती थी। न जाने किसके दबाव में एक-एक कर वे कॉलम बंद कर दिए गए। बांग्ला के बड़े मीडिया घरानों ने मुङो छापना बंद किया, तो मेरे पास अपने को व्यक्त करने का एकमात्र मंच ट्विटर बचा। मुङो अपने विचारों को अभिव्यक्त करने से नहीं रोका जा सकता। कट्टरपंथ के दबाव का आलम यह है कि बंगाल के तीन फिल्म निर्देशकों ने मेरे जीवन तथा दो उपन्यासों शोध और निमंत्रण पर फिल्म बनाने के करार पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन अब उन निर्देशकों ने अचानक मौन धारण कर लिया है। मुझे नहीं पता कि उन पर किसने दबाव डाला। क्या आपको लगता है कि विवाद खड़ा होने से ही यह सब हुआ?
मैंने कभी विवाद नहीं पैदा किया। मैंने किताबें लिखी हैं। मैं लोकतंत्र, मानवता, अभिव्यक्ति की आजादी और स्त्री मुक्ति के पक्ष में लिखती रही हूं। मैं औरत की मुकम्मल आजादी की पक्षपाती व पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्ववाद की विरोधी हूं। मैं ऐसी लेखिका हूं, जो अपने हृदय की बात सही-सही लिखती है, इसकी परवाह किए बिना कि कुछ लोग नाराज होंगे। जो लोग समाज को पीछे ले जाना चाहते हैं, उनके खिलाफ आवाज उठाती हूं। कट्टरपंथियों को यह पसंद नहीं, इसीलिए वे मेरी किताबें जलाते हैं, मेरे सिर पर इनाम रखते हैं। वे विवाद खड़ा करते हैं। पर सच्चाई के लिए मैं दस मर्तबा प्राण देने को तैयार हूं। कहीं आप खुद ही तो विवादों में नहीं रहना चाहतीं?
मैं विवाद में नहीं रहना चाहती, किंतु मेरे विचार चूंकि परंपरावादियों से नहीं मिलते, तो वे विवाद खड़ा करते हैं। यह आरोप सरासर गलत है कि अपनी किताबों की बिक्री बढ़ाने के लिए मैं उत्तेजक विषय उठाती हूं। यदि मेरी किताबें नहीं बिकतीं, तो कहा जाता कि लेखिका के रूप में मैं खारिज कर दी गई और किताबें बिकती हैं, तो आरोप मढ़ा जाता है कि बिक्री बढ़ाने के लिए मैं विचारोत्तेजक विषय उठाती हूं। यानी किसी भी तरह मुझ पर आरोप और दोष मढ़ा ही जाएगा। ऐसी आलोचनाओं की परवाह एक लेखिका करे, तो उसे लिखना बंद कर देना पड़ेगा। ऐसे आरोप सुनने की मैं आदी हो गई हूं। अच्छी बात यह है कि भारत और दुनिया में मेरे साहित्य के प्रशंसकों की संख्या बहुत है। भारत में उन लोगों की संख्या काफी है, जो मेरे विचारों का समर्थन करते हैं। क्या आप अब भी कोलकाता में आकर रहना चाहती हैं?
मैं कोलकाता में रहने के सपने अब भी देखती हूं, तभी तो भारत में रह रही हूं। मैं जब बांग्ला बोलने वालों के बीच रहूंगी, तभी बचूंगी। कोलकाता में मैं रह ही रही थी। फ्लैट तक ले लिया था, किंतु पांच वर्ष पहले कोलकाता से मुझे निर्वासित कर दिया गया। ममता बनर्जी अपनी पूर्ववर्ती माकपा सरकार की गलतियां सुधार रही हैं, तो उसी सरकार ने मुझे कोलकाता से बाहर करने की गलती की थी। इसलिए ममता सरकार से उम्मीद है कि वह मुझे कोलकाता लौटने दे। मैं 18 वर्षों से अपने देश से निर्वासित हूं। बांग्लादेश तो लौट नहीं सकती, अत: भारत में रहना चाहती हूं। भारत मुझे अपना ही देश लगता है। यहां न रह पाने की बात सोचकर ही सिहरन होती है।
कोलकाता प्रगतिशील लोगों का शहर है और वहां के पुस्तक मेले में मेरी किताब का लोकार्पण नहीं होने दिया गया, जबकि उस अनुष्ठान में मैं स्वयं उपस्थित नहीं थी। कतिपय कट्टरपंथी ताकतों की मांग को मेले के आयोजकों ने मान लिया। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने का मैंने स्वागत किया था, क्योंकि वह एक महिला हैं और पितृसत्तात्मक समाज में उन्होंने अपनी एक भूमिका निभाई है। मैं समझती थी कि वह मेरी वेदना समझोंगी, पर उनकी सरकार ने तो मेरी किताब को ही मेले से निर्वासित कर दिया। उनसे यह उम्मीद नहीं थी। मुझे बहुत दुख पहुंचा है। अब लगता है कि सारी पार्टियां कट्टरपंथियों से डरती हैं। कई बार तो कट्टरपंथियों की मांग के पहले ही सरकारें उन्हें खुश करने के लिए उनकी बात मान लेती हैं। लोकतंत्र के लिए यह खतरनाक है। कट्टरपंथियों के आगे झुकने के मामले में उस पार (बांग्लादेश) और इस पार (भारत, खासकर पश्चिम बंगाल) कोई अंतर है?
देखिए, भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां यदि कट्टरपंथ का पोषण किया जाता है, तो वह पड़ोसी देशों के लिए दृष्टांत बन जाता है। बांग्लादेश व आसपास के देश भारत की घटनाओं को उदाहरण के रूप में पेश करते हैं। इसलिए भारत को कभी भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे कट्टरपंथ को बढ़ावा मिले। भारत में यदि तुष्टीकरण की नीति अपनाई जाएगी, तो दूसरे धर्म के कट्टरपंथियों को नहीं रोका जा सकेगा, बल्कि उन्हें बढ़ने का मौका मिलेगा और वह मौका मिल रहा है। मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकने के मामले में भारत भी बांग्लादेश से अलग नहीं है। बंगाल में सरकार तो बदल गई, किंतु मेरे प्रति इस सरकार का रवैया भी वही है, जो पूर्ववर्ती सरकार का था। तुष्टीकरण की नीति अपनाने वाली राजनीतिक पार्टियों को खुश करने के लिए मेरे कॉलम तक कोलकाता में रोक दिए दए। पहले बांग्ला के अखबारों में मैं कॉलम लिखती थी। न जाने किसके दबाव में एक-एक कर वे कॉलम बंद कर दिए गए। बांग्ला के बड़े मीडिया घरानों ने मुङो छापना बंद किया, तो मेरे पास अपने को व्यक्त करने का एकमात्र मंच ट्विटर बचा। मुङो अपने विचारों को अभिव्यक्त करने से नहीं रोका जा सकता। कट्टरपंथ के दबाव का आलम यह है कि बंगाल के तीन फिल्म निर्देशकों ने मेरे जीवन तथा दो उपन्यासों शोध और निमंत्रण पर फिल्म बनाने के करार पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन अब उन निर्देशकों ने अचानक मौन धारण कर लिया है। मुझे नहीं पता कि उन पर किसने दबाव डाला। क्या आपको लगता है कि विवाद खड़ा होने से ही यह सब हुआ?
मैंने कभी विवाद नहीं पैदा किया। मैंने किताबें लिखी हैं। मैं लोकतंत्र, मानवता, अभिव्यक्ति की आजादी और स्त्री मुक्ति के पक्ष में लिखती रही हूं। मैं औरत की मुकम्मल आजादी की पक्षपाती व पितृसत्तात्मक समाज के वर्चस्ववाद की विरोधी हूं। मैं ऐसी लेखिका हूं, जो अपने हृदय की बात सही-सही लिखती है, इसकी परवाह किए बिना कि कुछ लोग नाराज होंगे। जो लोग समाज को पीछे ले जाना चाहते हैं, उनके खिलाफ आवाज उठाती हूं। कट्टरपंथियों को यह पसंद नहीं, इसीलिए वे मेरी किताबें जलाते हैं, मेरे सिर पर इनाम रखते हैं। वे विवाद खड़ा करते हैं। पर सच्चाई के लिए मैं दस मर्तबा प्राण देने को तैयार हूं। कहीं आप खुद ही तो विवादों में नहीं रहना चाहतीं?
मैं विवाद में नहीं रहना चाहती, किंतु मेरे विचार चूंकि परंपरावादियों से नहीं मिलते, तो वे विवाद खड़ा करते हैं। यह आरोप सरासर गलत है कि अपनी किताबों की बिक्री बढ़ाने के लिए मैं उत्तेजक विषय उठाती हूं। यदि मेरी किताबें नहीं बिकतीं, तो कहा जाता कि लेखिका के रूप में मैं खारिज कर दी गई और किताबें बिकती हैं, तो आरोप मढ़ा जाता है कि बिक्री बढ़ाने के लिए मैं विचारोत्तेजक विषय उठाती हूं। यानी किसी भी तरह मुझ पर आरोप और दोष मढ़ा ही जाएगा। ऐसी आलोचनाओं की परवाह एक लेखिका करे, तो उसे लिखना बंद कर देना पड़ेगा। ऐसे आरोप सुनने की मैं आदी हो गई हूं। अच्छी बात यह है कि भारत और दुनिया में मेरे साहित्य के प्रशंसकों की संख्या बहुत है। भारत में उन लोगों की संख्या काफी है, जो मेरे विचारों का समर्थन करते हैं। क्या आप अब भी कोलकाता में आकर रहना चाहती हैं?
मैं कोलकाता में रहने के सपने अब भी देखती हूं, तभी तो भारत में रह रही हूं। मैं जब बांग्ला बोलने वालों के बीच रहूंगी, तभी बचूंगी। कोलकाता में मैं रह ही रही थी। फ्लैट तक ले लिया था, किंतु पांच वर्ष पहले कोलकाता से मुझे निर्वासित कर दिया गया। ममता बनर्जी अपनी पूर्ववर्ती माकपा सरकार की गलतियां सुधार रही हैं, तो उसी सरकार ने मुझे कोलकाता से बाहर करने की गलती की थी। इसलिए ममता सरकार से उम्मीद है कि वह मुझे कोलकाता लौटने दे। मैं 18 वर्षों से अपने देश से निर्वासित हूं। बांग्लादेश तो लौट नहीं सकती, अत: भारत में रहना चाहती हूं। भारत मुझे अपना ही देश लगता है। यहां न रह पाने की बात सोचकर ही सिहरन होती है।
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