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एक नई शुरुआत
First Published:06-02-12 09:53 PM
नेपाल में शांति प्रक्रिया इस कदर आगे बढ़ रही है कि इस दिशा में उठाए गए तमाम दूसरे कदम मामूली-से लगते हैं। वास्तव में, इस समय देश के राजनीतिक परिदृश्य में एक ठहराव-सा आ गया है, क्योंकि सियासी पार्टियां संविधान के अलावा इस बात पर भी अब तक कोई एकराय कायम नहीं कर पाई हैं कि पूर्व माओवादी लड़ाके फौज में आखिर किस ओहदे पर शामिल किए जाएं। बहरहाल, हाल ही में कई माओवादियों ने स्वेच्छा से रिटायरमेंट लेकर अपने घर जाने का कदम उठाया है। यकीनन यह एक छोटा कदम है, लेकिन काफी महत्वपूर्ण है। अनेक लड़ाकों के सैन्य छावनी छोड़ने के साथ अब यह तो साफ हो गया है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी आहिस्ता-आहिस्ता टूट रही है। ऐसे में, माओवादी पार्टी के पास विभिन्न मसलों पर अन्य पार्टियों के भयादोहन की ताकत भी क्षीण हो जाएगी और चूंकि शेष बचे लड़ाकों को अनिश्चिय की स्थिति में रोके रखना अब माओवादी नेतृत्व के लिए कठिन हो जाएगा, ऐसे में उसे नई व्यवस्था में उनके ओहदे के सवाल पर जल्दी से जल्दी अपनी कोई राय बनानी होगी। लेकिन पूर्व माओवादी लड़ाकों के स्वैच्छिक अवकाश की यह प्रवृत्ति एक गंभीर आशंका भी पैदा करती है। इस प्रवृत्ति में कहीं न कहीं उनकी हताशा भी उजागर होती है। उनमें से कइयों ने तो कैंप छोड़ने की कवायद के बीच अपनी विभिन्न मांगें रखी हैं। वे मांग कर रहे हैं कि उनकी पूर्व भूमिका के लिए सरकार की तरफ से दिया जाने वाला प्रमाण-पत्र उनकी मौजूदा हैसियत के मुताबिक हो, न कि साल 2006 में युद्ध समाप्ति के वक्त के उनके सांगठनिक पद के अनुसार। इन मांगों से साफ है कि ये लड़ाके अपने लिए सरकार से बेहतर डील चाहते हैं। इसके साथ ही अपने साथ हो रहे बर्ताव को लेकर उनमें गहरा असंतोष है और उनमें यह अहसास पैदा हो रहा है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में जो भी कुर्बानियां दीं, उनका कोई अर्थ नहीं निकला। यह गंभीर चिंता की बात है कि हजारों की तादाद में सैन्य प्रशिक्षित हताश लोग अपने-अपने कुनबे में जिंदगी की नई शुरुआत करने के लिए लौट रहे हैं। साफ है, यह समस्या का समाधान नहीं है, इस पर सिर्फ माओवादी पार्टी ही नहीं, पूरे राजनीतिक वर्ग को ध्यान देना होगा।
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल
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