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गली गली चोर है
विशाल ठाकुर
First Published:03-02-12 09:52 PM
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ताजा ज्वलनशील मुद्दों पर फिल्में बनाना बॉलीवुड को हमेशा रास नहीं आता, लेकिन कभी-कभी रास आ भी जाता है। जब कोई निर्देशक संजीदा अंदाज में नो वन किल्ड जेसिका जैसी फिल्म बनाता है तो न केवल दर्शक उसे पसंद करते हैं, बल्कि बॉक्स ऑफिर का दुलार भी उस फिल्म को मिलता है। देश के पांच राज्यों में चुनाव का माहौल है। राजनीतिक सरगर्मी अपने फुल मोड पर है। ऐसे में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर फिल्म बनाना एक बेहतर आइडिया हो सकता है।

लेकिन अगर ये एक बेहतर आइडिया है तो इंडस्ट्री के बड़े-बड़े निर्माता और प्रोडक्शन हाउस ऐसी फिल्में क्यों नहीं बना रहे? क्यों तीन फ्लॉप फिल्में बना चुके निर्देशक रूमी जाफरी का ध्यान इस ओर गया। इन तमाम बातों का जवाब इस फिल्म में काफी हद तक मिल जाता है। फिल्म की कहानी भोपाल में रहने वाले भारत पर केन्द्रित है, जो कि एक बैंक में कैशियर है। उसके दादा स्वतंत्रता सेनानी थे, इसलिए वह भी एक पक्का देशभक्त है।

लेकिन उसकी देशभक्ति में उस दिन से छेद होने लगते हैं, जब वह एक स्थानीय नेता मंकू त्रिपाठी (मुरली शर्मा) के भाई सत्तू त्रिपाठी (अमित मिस्त्री) के पार्टी कार्यालय के लिए अपने घर का एक कमरा देने से मना कर देता है। सत्तू और भारत एक ही रामलीला में भी काम करते हैं। सत्तू अपने भाई के बल पर राम बनता है और भारत पब्लिक डिमांड पर हनुमान।

सत्तू स्थानीय पुलिस प्रशासन को अपने प्रभाव में लेकर भारत को एक चोरी के पंखे का मालिक बनवा देता है, जिसकी सुपुर्दगी के लिए हवलदार कुशवाहा (अनु मलिक) से लेकर एक चोर चुन्नु फरिश्ता (विजय राज) और झूठे गवाह बच्चू गुलकंद को तगड़ी घूस खिलानी पड़ती है। कुछ सौ रुपयों का वो पंखा घर आते-आते 31 हजार रुपये का बैठ जाता है। भारत की मुसीबतें यहीं खत्म नहीं होतीं। असल दिक्कत तो तब आती है, जब वह एक बम धमाके का आरोपी बन जाता है और जिससे बचने के लिए उसके पिता (सतीश कौशिक) को अपना घर तक बेचना पड़ जाता है।

भोपाल जैसे शहर में भ्रष्टाचार जैसी थीम को फोकस करने के लिए जरूरी है कि वहां की स्थानीय गतिविधियों और फिल्म की पटकथा को पटरी से उतरने न दिया जाए। इस मामले में रूमी जाफरी काफी हद तक सफल हुए हैं। बेशक वह निर्देशक बनने से पहले एक लेखक थे। फिल्म के हर दूसरे सीन में भ्रष्ट सिस्टम पर एक कटाक्ष है, जिसे हल्के-फुल्के अंदाज में कहा गया है, इसलिए फिल्म भारी नहीं लगती। उपदेशों से बचा गया है। लगभग सभी पात्रों ने सहज अभिनय किया है, जिससे फिल्म में ड्रामे की गुंजाइश नहीं रह गई है। यहां तक कि फिल्म के क्लाईमैक्स में भी किसी सरप्राइज से बचते हुए निर्देशक ने फिल्म को अचानक से खत्म कर दिया। इसीलिए ये अंत रुटीन से हट कर लगेगा।

फिल्म में वीना मलिक के आइटम गीत का फिल्मांकन जबरदस्त है। इसकी धुन काफी बढ़िया है। हालांकि इस गीत को देख कर तो यही लगता है कि इसे बेवजह ठूंसा गया है, लेकिन आजकल ज्यादातर आइटम गीत ठूंसे ही तो जाते हैं। मुसीबत के समय भारत की पत्नी निशा (श्रेया सरन) का घर छोड़ कर जाना अटपटा लगता है। इसी तरह से मुग्धा का रोल भी जबरदस्ती ठूंसा गया लगता है। फिल्म में अनु कपूर का अंदाज बांधे रखता है और अक्षय खन्ना प्रभावी लगे हैं। कुल मिला कर यह फिल्म भ्रष्टाचार का कोई तोड़ तो नहीं सुझाती, लेकिन एक आम आदमी को उसी की परेशानी से कुछ पल के लिए रू-ब-रू जरूर कराती है।
कलाकार: अक्षय खन्ना, सतीश कौशिक, श्रेया सरन, मुग्धा गोडसे, अनु कपूर, विजय राज
निर्माता: नितिन मनमोहन
निर्देशक: रूमी जाफरी
संगीत: अनु मलिक
कहानी: मुमुक्शु मुद्गल
पटकथा एवं संवाद: मुमुक्शु मुद्गल और रूमी जाफरी

 
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