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हां भई, आपके ‘हिन्दुस्तान’ में यह गड़बड़ नहीं चल रही
आगरा, प्रमुख संवाददाता
First Published:23-02-12 12:04 AM
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जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष की आगरा में हुई एक प्रेस कांफ्रेंस की आजकल बड़ी चर्चा है। बात ही ऐसी है। पेड न्यूज के खिलाफ संसद के अंदर और बाहर आवाज उठाने वाले शरद यादव ने इस चुनाव में कुछ अखबारों के कारनामों पर अपने अंदाज में बेबाक टिप्पणियां की तो हिन्दुस्तान की खुले दिल से तारीफ।

बात दो दिन पहले की है। आगरा के एक बड़े होटल का बड़ा सा हॉल। 11.30 बज रहे हैं। बेबाक बोल बोलने वाले शरद यादव हॉल में एक ओर लगी कुर्सी पर बैठे हैं। मेज के दूसरी ओर लगी कुर्सियों पर पत्रकार एक-एक कर बैठ रहे हैं।

तब ही शरद की आवाज गूंजी ‘भई सब आ गए, बात शुरू करें।’ बात यूपी के चुनावी परिदृश्य से शुरू होती है।

देखिए इस प्रदेश में हालात त्रिशंकु विधानसभा के रहेंगे। किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने जा रहा। फिर गंभीर अंदाज में कुछ रुकते हुए बोले वैसे भी ऐसी विधानसभा का मतलब ही क्या है जहां न मुद्दे हों और न ही आम आदमी की बात। कोई लैपटॉप बांट रहा है तो कोई मोबाइल। पत्रकार भी सवाल करना शुरू करते हैं और शरद धीर-गंभीर आवाज में एक-एक का जवाब देते हैं।

यूपी की बदहाली का जिक्र होता है। खेती-किसानी की बात होती है। फिर कहा कि विकास की बात कोई नहीं करता। सवाल उठा कि शरदजी आपकी पार्टी यूपी में क्यों चुनाव लड़ रही है। बीजेपी को हराने के लिए या खुद जीतने के लिए? थोड़ा रुके फिर दार्शनिक अंदाज में कहा देखिए यह चुनाव हम जीतने के लिए नहीं केवल जनता के मुद्दों को जिंदा रखने के लिए लड़ रहे हैं। यह सिलसिला तकरीबन 30-35 मिनट तक चला।

12 बज चुके थे। शरद अपनी कुर्सी से खड़े हुए। चाय की टेबल की ओर बढ़ते हुए मीडियाकर्मियों से परिचय का सिलसिला शुरू हो गया। उन्होंने यूपी से प्रकाशित एक प्रमुख अखबार के संवाददाता से परिचय पूछा। अखबार का नाम सुनना था कि बोले अच्छा तो तुम फलां अखबार से हो। तुम्हारे सेठजी तो थैले भर-भरकर नोट ले रहे हैं। खूब मोटी-मोटी गड्डियां पहुंच रही हैं आपके यहां तो। उनका यह कहना था कि चारों ओर की चटर-पटर एकाएक थम गई। मानो सबको सांप सूंघ गया हो।

इसी बीच वह एक और प्रमुख अखबार के प्रतिनिधि की ओर मुड़े। उसका अपना नाम और अखबार का नाम बताना भारी पड़ गया। छूटते ही बोले, अच्छा आप उस अखबार से हैं। भई खेल तो तुम्हारे यहां भी खूब चल रहा है। पैसे ले-लेकर खबरें छापी जा रही हैं। यह ठीक नहीं है। अब तो सब एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। न जाने अब किसकी बारी हो।

खैर, बारी ‘हिन्दुस्तान’ के संवाददाता की थी। ‘हिन्दुस्तान’ का नाम सुनते ही मुस्कराते हुए बोले कि हां, आपके यहां यह सब नहीं चल रहा है। ‘हिन्दुस्तान’ में ऐसी कोई गड़बड़ नहीं हो रही। फिर उन्होंने ‘हिन्दुस्तान’ द्वारा चलाए जा रहे आओ राजनीति करें अभियान को भी सराहा। यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ।

फिर हालिया प्रकाशित एक अखबार का नाम खुद ही लेते हुए बोले कि ‘उन्होंने तो हद ही कर दी है। हमारे ऐसे प्रत्याशियों से जिनकी जमानत जब्त हो रही है, उनसे भी जबरिया पैसे मांग रहे हैं। मैंने सब रिकार्ड करवा लिया है।’ फिर गर्म हो चले माहौल को हल्का करने की कोशिश में कुछ दूसरी बातें होती हैं और बातचीत का सिलसिला यहीं खत्म हो जाता है।

बातचीत हॉल में तो खत्म हो गई लेकिन वहां से निकलकर अब मीडियाकर्मियों में इसकी खूब चर्चा है।

 
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