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दिन भर
First Published:18-02-12 10:48 PM
आज दिन भर कुछ नहीं किया
सुबह की झील में
एक कंकड़ी मार कर बैठ गया तट पर
और उसमें उठने वाली लहरों को देखता रहा
शाम को लोग घर लौटे तो
न जाने क्या-क्या सामान थे उनके पास
मेरे पास कुछ नहीं था
केवल एक अनुभव था
कंकड़ी और लहरों के संबंध से बना हुआ। उत्तर
उस दिन साथियों की भीड़ में
किसी बच्चे ने आकर एक पत्र थमा दिया था
वह प्रेम-पत्र था-पता नहीं किसका
तब से मैं प्रेम-पत्र का उत्तर दिए जा रहा हूं
कभी गद्य में, कभी पद्य में
कभी इसको, कभी उसको
जाने किस-किसको
जोह, कितने वर्ष हो गए उत्तर लिखते हुए.. अक्सर वह कोई
आते-जाते मिल जाता है अक्सर वह कोई
हंसते रहते ओठ, आंख जैसे रोयी-रोयी
हालचाल पूछता, दर्द लेकर चल देता है
घनी उमस में पात कोई पंखा झल देता है
लौट चली आती वंशी में धुन खोयी-खोयी
पथरायी आंखों में उग आता कोई सपना
वीराने में सुनता हूं मैं नाम कहीं अपना
जग उठती है प्यास सफर की राहों में सोयी शायद फिर
आहट-सी हो रही महक-सा कुछ लहराया है
द्वार खोल देखो, शायद फिर कोई आया है
बंद कक्ष में रातें तड़पीं, दिन कितना रोये
कितने वत्सर बीत गए, खुद में खोए-खोए
उड़ते चले गए आंखों से पंछी सपनों के
पथरा गई प्रतीक्षा भी अब किसकी माया है
देखो फिर शायद चौखट पर हंसी धूप ताजा
शायद किसी हवा ने फिर थपथपाया दरवाजा
कब तक सीलन में सोओगे टूटी घड़ियों की
सुनो, तुम्हारे लिए गीत मौसम ने गाया है वसंत पंचमी
खेतों में आदिगंत उमड़ी हुई सरसों की पीली-पीली आभा
उस पर फैली हुई चम्पई धूप की नहाई हुई हंसी
ठिठुरे हुए पंखों में थरथराता उन्मुक्त उड़ान का संगीत
सरोवरों के निथरे जल में झरती छोटी-छोटी परछाइयां
ठहरे हुए रास्तों का चल पड़ना गाते हुए
अल्हड़ हवाओं में आंचल की तरह
अपने से छूट-छूट कर फड़फड़ाना पीली-पीली घड़ियों का
और मन में तैर जाना कितने-कितने स्वप्न-बिम्बों का
तुम नवजीवन के मंगलाचरण की तरह गूंज उठती हो वसंत पंचमी
जड़ में, चेतन में
और साल भर
खुशबू की तरह इंतजार रहता है तुम्हारे आने का
लेकिन अब ?
अब तो
भीड़-भाड़ और शोर-शराबे वाले मोहल्ले के
एक छोटे-से मकान के आगे, थोड़े खुले हिस्से में
तुम्हारी धूप का एक छोटा-सा टुकड़ा
थोड़ी देर छटपटाता है, फिर उड़ जाता है
और हम बैठे रह जाते हैं खांसते हुए
या अखबार में हत्याओं, बलात्कारों की खबर पढ़ते हुए।
(आम के पत्ते, प्रकाशक: इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली से साभार)
सुबह की झील में
एक कंकड़ी मार कर बैठ गया तट पर
और उसमें उठने वाली लहरों को देखता रहा
शाम को लोग घर लौटे तो
न जाने क्या-क्या सामान थे उनके पास
मेरे पास कुछ नहीं था
केवल एक अनुभव था
कंकड़ी और लहरों के संबंध से बना हुआ। उत्तर
उस दिन साथियों की भीड़ में
किसी बच्चे ने आकर एक पत्र थमा दिया था
वह प्रेम-पत्र था-पता नहीं किसका
तब से मैं प्रेम-पत्र का उत्तर दिए जा रहा हूं
कभी गद्य में, कभी पद्य में
कभी इसको, कभी उसको
जाने किस-किसको
जोह, कितने वर्ष हो गए उत्तर लिखते हुए.. अक्सर वह कोई
आते-जाते मिल जाता है अक्सर वह कोई
हंसते रहते ओठ, आंख जैसे रोयी-रोयी
हालचाल पूछता, दर्द लेकर चल देता है
घनी उमस में पात कोई पंखा झल देता है
लौट चली आती वंशी में धुन खोयी-खोयी
पथरायी आंखों में उग आता कोई सपना
वीराने में सुनता हूं मैं नाम कहीं अपना
जग उठती है प्यास सफर की राहों में सोयी शायद फिर
आहट-सी हो रही महक-सा कुछ लहराया है
द्वार खोल देखो, शायद फिर कोई आया है
बंद कक्ष में रातें तड़पीं, दिन कितना रोये
कितने वत्सर बीत गए, खुद में खोए-खोए
उड़ते चले गए आंखों से पंछी सपनों के
पथरा गई प्रतीक्षा भी अब किसकी माया है
देखो फिर शायद चौखट पर हंसी धूप ताजा
शायद किसी हवा ने फिर थपथपाया दरवाजा
कब तक सीलन में सोओगे टूटी घड़ियों की
सुनो, तुम्हारे लिए गीत मौसम ने गाया है वसंत पंचमी
खेतों में आदिगंत उमड़ी हुई सरसों की पीली-पीली आभा
उस पर फैली हुई चम्पई धूप की नहाई हुई हंसी
ठिठुरे हुए पंखों में थरथराता उन्मुक्त उड़ान का संगीत
सरोवरों के निथरे जल में झरती छोटी-छोटी परछाइयां
ठहरे हुए रास्तों का चल पड़ना गाते हुए
अल्हड़ हवाओं में आंचल की तरह
अपने से छूट-छूट कर फड़फड़ाना पीली-पीली घड़ियों का
और मन में तैर जाना कितने-कितने स्वप्न-बिम्बों का
तुम नवजीवन के मंगलाचरण की तरह गूंज उठती हो वसंत पंचमी
जड़ में, चेतन में
और साल भर
खुशबू की तरह इंतजार रहता है तुम्हारे आने का
लेकिन अब ?
अब तो
भीड़-भाड़ और शोर-शराबे वाले मोहल्ले के
एक छोटे-से मकान के आगे, थोड़े खुले हिस्से में
तुम्हारी धूप का एक छोटा-सा टुकड़ा
थोड़ी देर छटपटाता है, फिर उड़ जाता है
और हम बैठे रह जाते हैं खांसते हुए
या अखबार में हत्याओं, बलात्कारों की खबर पढ़ते हुए।
(आम के पत्ते, प्रकाशक: इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली से साभार)
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