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ताकि जल उठे प्रेम भक्ति की ज्योति
रामकृष्ण परमहंस
First Published:20-02-12 09:55 PM
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एक किसान ने सारा दिन गन्ने के खेत में पानी सींचने के बाद जाकर देखा कि खेत में बूंद भर भी पानी नहीं पहुंचा है। खेत में कुछ बड़े-बड़े बिल थे और सारा पानी उन बिलों में से होकर दूसरी ओर बह गया था। इसी प्रकार, जो व्यक्ति मन में विषय वासना, मान-यश, सुख-सुविधा की आकांक्षा रखते हुए ईश्वर की उपासना करता है, वह यदि जीवन भर भी नियमित रूप से साधना करता रहे तो भी अन्त में यही देखता है कि उसकी सारी साधना उन वासनारूपी बिलों में से बाहर निकल गई है और वह जैसा का तैसा ही रह गया है, तनिक भी प्रगति नहीं कर पाया।

ईश्वर का ध्यान करते समय मन स्थिर क्यों नहीं होता? मक्खी जब हलवाई की दुकान में रखी मिठाई पर बैठती है, ऐसे में अगर कोई मेहतर मैले की टोकरी लेकर सड़क पर गुजरे तो वह तुरन्त मिठाई को छोड़ कर मैले पर जा बैठती है। परन्तु मधुमक्खी सदा फूलों पर ही बैठती है, गंदी चीजों पर कभी नहीं बैठती। संसारी जीव भी मक्खी की तरह है, बीच-बीच में क्षण भर भगवद्भक्ति का स्वाद चखता है, पर दूसरे ही क्षण उसकी स्वाभाविक विषयतृष्णा उसे संसार के विषय भोगों में खींच लाती है। किन्तु जो परमहंस होते हैं, वे सदा भगवान में तल्लीन रहते हुए भक्तिरस का पान करते हैं।

गीली दियासलाई को तुम कितना भी घिसो, वह नहीं जलती, पर सूखी दियासलाई एक बार घिसते ही तुरन्त जल जाती है। सच्चे भक्त का मन सूखी दियासलाई के समान होता है। थोड़ा ईश्वर का नाम सुनते ही उसमें प्रेम भक्ति की ज्योति जल उठती है, परन्तु संसारी व्यक्ति का मन गीली दियासलाई की भांति काम-कांचन की आसक्ति में भीगा होता है, उसे ईश्वर की महिमा कितनी भी सुनाई जाए, उसमें भगवद्भक्ति नहीं सुलगाई जा सकती।

संसारी व्यक्ति में ज्ञानी पुरुषों के समान ज्ञान और बुद्धि हो सकती है। वह योगियों की तरह कष्ट क्लेश सह सकता है और तपस्वियों की भांति त्याग कर सकता है, परन्तु उसके ये सारे श्रम व्यर्थ ही होते हैं, क्योंकि उसकी शक्तियां गलत दिशा में प्रवाहित होती हैं। वह अपनी सारी शक्ति नाम, यश और धन कमाने में ही लगाता है, भगवान के लिए नहीं।

मैले दर्पण में सूर्य का प्रकाश प्रतिबिम्बित नहीं होता, स्वच्छ दर्पण में ही वह प्रतिबिम्बित होता है। मायामुग्ध, अशुद्ध और अपवित्र हृदय वाले व्यक्ति ईश्वरीय महिमा का प्रकाश नहीं देख पाते, विशुद्ध हृदय व्यक्ति ही उसे देख पाते हैं। इसलिए विशुद्ध बनने का प्रयत्न करो।

दूध में अगर उसका दुगुना पानी मिला हुआ हो तो उसकी खीर बनाने में बहुत समय और अत्यधिक श्रम लगता है। विषयी लोगों के मन में मलिन विषय-वासना और कुविचारों की अत्यधिक मिलावट होने के कारण उसे शुद्ध और पवित्र बनाने के लिए दीर्घ समय तक कठिन परिश्रम करना पड़ता है।

संसारी जीव सब कुछ त्याग कर भगवान को क्यों नहीं भज सकता? क्या कोई नट रंगमंच से उतरते ही अपना मुखौटा हटा देता है? संसारियों को पहले नाटक में अपना काम पूरा कर लेने दो, उसके बाद ठीक समय पर वे अपना बनावटी साज उतारेंगे।

बद्ध जीव मगर की तरह होते हैं। मगर की देह पर शस्त्र द्वारा वार करने पर शस्त्र छिटक कर गिर पड़ता है, मगर को कुछ नहीं होता। सिर्फ पेट पर वार करने पर ही वह मरता है। इसी तरह, बद्ध जीव को कितना भी धर्मोपदेश दो, कितनी भी ज्ञान-वैराग्य की बातें सुनाओ, उसके हृदय पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता। इसके लिए तो उसकी आसक्ति के विषयों पर ही प्रहार करना पड़ेगा।

संसारी लोगों से अगर कहो कि सब कुछ त्याग कर भगवान के चरण कमलों में मग्न हो जाओ तो वे कभी नहीं सुनेंगे। इसलिए गौर-निताई दो भाइयों ने मिल कर सलाह करके विषयी लोगों को आकर्षित करने का उपाय ढूंढ़ निकाला। वे कहने लगे- ‘तुम्हें मागुर मछली का रसा मिलेगा, नवयुवती की गोद मिलेगी, तुम ‘हरि-हरि’ बोलो।’ पहली दो वस्तुओं के लोभ से अनेक लोग उनके साथ हरिनाम लेने में शामिल होने लगे। फिर धीरे-धीरे जब उन्हें हरिनाम-रस का थोड़ा स्वाद मिलने लगा, तब निताई-गौर के कहने का अर्थ उनकी समझ में आ गया। मागुर मछली का रसा और कुछ नहीं- हरि प्रेम में विभोर होने पर नेत्रों से जो आंसुओं की धार बहने लगती है, वह मागुर मछली का रसा है। और नवयुवती के माने हैं पृथ्वी, नवयुवती की गोद मिलना। यानी हरि प्रेम में ओतप्रोत होकर धरती पर लोटना।

 
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